Thursday, May 28, 2009

देह की गोलाईयों तक आ गये / चंद्रसेन विराट

दुष्यंत जी के बाद शायद पहली बार इतनी चुभती हुई गज़ल पढनें को मिली । एक एक शेर अन्दर तक असर करता है ।


तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये
थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये

यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच का
थे कभी दुल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये

वक्त का पहिया किसे कुचले कहां कब क्या पता
थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं
जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये

देश के संदर्भ मे तुम बोल लेते खूब हो
बात ध्वज की थी चलाई कुर्सियों तक आ गये

प्रेम के आख्यान मे तुम आत्मा से थे चले
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये

कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को
तुम ॠचाएं मानते थे गालियों तक आ गये

सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा
देवताओं से शुरु की वहशियों तक आ गये
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चंद्रसेन विराट

2 comments:

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

बहुत प्यारी ग़ज़ल...! विराट जी हमेशा श्रेष्ट चिंतन-प्रधान रचनाएँ लिखते हैं...उन्हें बधाई!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

अनूप जी,

आरज़ू चाँद सी निखर जाए,
जिंदगी रौशनी से भर जाए,
बारिशें हों वहाँ पे खुशियों की,
जिस तरफ आपकी नज़र जाए।
जन्‍मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
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ब्‍लॉग समीक्षा की 32वीं कड़ी..
पैसे बरसाने वाला भूत!