Wednesday, November 22, 2006

एक खूबसूरत फ़िल्म - डोर

कभी कभी कई वर्षों में एक फ़िल्म ऐसी आती है जिसे देखनें के बाद लगता है जैसे आप नें एक बहुत अच्छा काम किया हो , एक सुन्दर सा अहसास छोड जाती है और आप का फ़िल्मों के प्रति एक नया 'विश्वास' सा बननें लगता है । 'डोर' एक ऐसी ही फ़िल्म है ।

एक चुनौती भरा विषय लेकिन विषय पर 'फ़ोकस' सीधी सादी पटकथा , बेकार की नाटकीयता नहीं , सुन्दर - सहज अभिनय , खूबसूरत 'फ़ोटोग्राफ़ी' ।

कहानी बता कर आप का मज़ा नहीं बिगाड़ना चाहता ।

'गुल पनाग' (जिन की मैं शायद पहली फ़िल्म देख रहा था) का अभिनय फ़िल्म की जान है । अपनें किरदार को जिया है उन्होनें । उन की आंखों में चमक , अपनें लक्ष्य के प्रति ईमानदारी और विश्वास देखनें लायक है । श्रेयस तलपदे (जिन्हे पहले 'इकबाल' में देखा था) एक हल्की फ़ुल्की भूमिका में बहुत जमें हैं और फ़िल्म को गम्भीर होनें से बचाते हैं । उन का फ़िल्म के अंत में 'गुल पनाग' से अपनें प्रेम का इज़हार और उतनी ही सहजता से 'गुल पनाग' का उत्तर याद रहेगा । आयशा टकिया का अभिनय भी अच्छा है । किरदार की मासूमियत को उन्होनें अच्छा निभाया है । फ़िल्म में जयपुर और जोधपुर के खूबसूरत स्थानों को चुना गया है जो देखनें लायक हैं ।

नागेश कुकुनूर का निर्देशन बहुत कसा हुआ है , एक लीक से हट कर कहानी का चुनाव किया है उन्होनें (अपनी पिछली फ़िल्म इकबाल की तरह) । नागेश की उम्र बहुत कम है , उन से आगे बहुत सम्भावनायें हैं ।

'डोर' पिछले कई वर्षों मे आनें वाली सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों मे से एक लगी । अगर हाथ लगे तो ज़रूर देखियेगा और बताइयेगा कि फ़िल्म और मेरी पहली 'फ़िल्म आलोचना' कैसी लगी ?

Saturday, November 18, 2006

किस तरह मिलूँ तुम्हें - पवन करण की प्रेम कविता

किस तरह मिलूँ तुम्हें

क्यों न खाली क्लास रूम में
किसी बेंच के नीचे
और पेंसिल की तरह पड़ा
तुम चुपचाप उठा कर
रख लो मुझे बस्ते में

क्यों न किसी मेले में
और तुम्हारी पसन्द के रंग में
रिबन की शक्ल में दूँ दिखाई
और तुम छुपाती हुई अपनी ख़ुशी
खरीद लो मुझे

या कि इस तरह मिलूँ
जैसे बीच राह में टूटी
तुम्हारी चप्पल के लिये
बहुत ज़रूरी पिन

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'स्त्री मेरे भीतर' पुस्तक से

Monday, November 13, 2006

चन्द शेर - बशीर बद्र साहब के

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ।
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ज़िन्दगी तूनें मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फ़ैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है ।
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जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता ।
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कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले लगोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो ।
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दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।
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एक दिन तुझ से मिलनें ज़रूर आऊँगा
ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये ।
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इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे ।
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वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहनें तो दूसरा ही लगे ।
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनानें में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलानें में।
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पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आँखो को अभी ख्वाब छुपानें नहीं आते ।
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तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था.
फ़िर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला ।
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मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उस नें मुझे चाहा बहुत है ।
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मैं इतना बदमुआश नहीं यानि खुल के बैठ
चुभनें लगी है धूप तो स्वेटर उतार दे ।

Wednesday, November 01, 2006

दोहे - निदा फ़ाज़ली के

१.
छोटा कर के देखिये, जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है, बाँहो भर संसार ।

२.
वो सूफ़ी का कौ़ल हो, या गीता का ज्ञान
जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान
३.
सात समुन्दर पार से कोई करे व्यापार
पहले भेजे सरहदें, फ़िर भेजे हथियार
४.
बच्चा बोला देख कर,मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान
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निदा फ़ाज़ली

Monday, October 30, 2006

वह नहीं कहती

उसनें कहा
उसके पास एक छोटा सा ह्रदय है

जैसे धूप कहे
उसके पास थोड़ी सी रौशनी है

आग कहे
उसके पास थोड़ी सी गरमाहट---

धूप नहीं कहती उसके पास अंतरिक्ष है
आग नहीं कहती उसके पास लपटें
वह नहीं कहती उसके पास देह ।

- अशोक वाजपेयी

अश्‍आर मिरे यूँ तो जमाने के लिये हैं


अश्‍आर मेरे यूँ तो जमाने के लिये हैं
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनानें के लिये हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेज़े से लगानें के लिये हैं

आंखों में जो भर लोगे, तो काँटो से चुभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों में सजानें के लिये हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलानें के लिये हैं


सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझानें के लिये है


ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलानें के लिये है
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जाँनिसार अख़्तर

इल्म:ज्ञान , सौदा:पागलपन , रिसाले: पत्रिकाएँ